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श्री वराह वराही के प्रसिद्ध मंदिर
Famous Temples of Shri Varaha Varahi
Mon 25th August 2025
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शक्तिपीठ श्री वाराही देवी मंदिरउत्तराखंड - भगवान विष्णु के तीसरे महावतार भगवान वाराह हैं और माता वाराही इनकी महाऊर्जा। क्योंकि दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को रसातल में छिपा दिया था तब भगवान विष्णु ने वाराह अवतार लेकर पृथ्वी को बचाया। यह पृथ्वी या भूमि माता वाराही का ही स्वरूप थी और इन्ही की ऊर्जा से भगवान वाराह की ऊर्जा दोगुनी हो गई और भगवान वाराह ने हिरण्याक्ष का नाश कर मानव जाति को बचाया। माता वाराही को सप्त मातृका में स्थान मिला है। मां वाराही को मां त्रिपुरासुंदरी की सेनापति और लक्ष्मी का स्वरूप भी माना गया है। भारत में माता वाराही के बहुत ही कम प्रसिद्ध मंदिर है। उनमें से उत्तराखंड में देवीधुरा का श्री वाराही मंदिर शक्तिपीठ है जहां मां सती के दांत गिरे थे। कहते हैं यहां पर माता की मूर्ति में इतनी ऊर्जा है कि कोई व्यक्ति सीधी आंखों से मां के दर्शन नहीं कर पाता है, इसलिए मां की मूर्ति को कांच और तांबे की पेटी में रखा जाता है, जहां से भक्त उनके दर्शन कर पाते हैं। इस मंदिर में मां वाराही के साथ भगवान वाराह की पूजा भी की जाती है। साथ ही देवभूमि उत्तराखंड में भगवान शिव के साथ भगवान विष्णु की महिमा का विशेष वर्णन होने के कारण देवभूमि में भगवान विष्णु के किसी भी अवतार की पूजा करना अत्यंत फलदाई माना जाता है।
श्री वराह मंदिर, हरिद्वार देवधाम - श्री वराह मंदिर, हरिद्वार में दक्ष मंदिर के समीप, पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर अपने चमत्कार और पौराणिक इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। माना जाता है कि इस मंदिर में स्थापित भगवान विष्णु के वराह अवतार की पाषाण प्रतिमा अति प्राचीन है। इस प्रतिमा में उनका सिर शूकर का और शरीर मानव का है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के साथ उनके वराह अवतार की पूजा की जाती है। यह मंदिर हरिद्वार के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है। माना जाता है जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार के रूप में दैत्यराज हिरण्याक्ष को मारकर उसके द्वारा जल में रखी गई पृथ्वी जिन्हे माँ वाराही का रूप माना जाता है, को दंत के अग्रभाग पर धारण कर बाहर निकाला था। तब हरिद्वार उनके दंत के अग्रभाग पर टिका हुआ था। इसलिए हरिद्वार तीर्थ में इस मंदिर में की गई पूजा अत्यंत शुभ फलदायक मानी जाती है। भक्त यहां पूजा में भाग लेकर भूमि-भवन, धन और सुख समृद्धि प्राप्त करते हैं।
मां वाराही मंदिर, रामेश्वरमदेवधाम - यह मंदिर अपने चमत्कार और पौराणिक इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर में स्थापित मां वाराही की पाषाण प्रतिमा अति प्राचीन है। माना जाता है, इस मंदिर की प्रतिमा को सृष्टि के रचयिता भगवान् श्री ब्रह्मा जी द्वारा बनाया गया था. इस प्रतिमा में उनका सिर शूकर का और शरीर मानव का है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के साथ मां वाराही की पूजा की जाती है। मां वाराही की ऊर्जा, इस मंदिर में पूजा करने से दोगुनी होकर फल देती है। यह मंदिर रामेश्वरम के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर में की गई पूजा अत्यंत शुभ फलदायक मानी जाती है। भक्त यहां पूजा में भाग लेकर भूमि-भवन, धन और सुख समृद्धि प्राप्त करते हैं।
श्री वाराह वाराही मंदिर, प्रयागराज और देवधाम - भगवान विष्णु के तीसरे महावतार भगवान वाराह हैं और माता वाराही इनकी महाऊर्जा। क्योंकि दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को रसातल में छिपा दिया था तब भगवान विष्णु ने वाराह अवतार लेकर पृथ्वी को बचाया। यह पृथ्वी या भूमि माता वाराही का ही स्वरूप थी और इन्ही की ऊर्जा से भगवान वाराह की ऊर्जा दोगुनी हो गई और भगवान वाराह ने हिरण्याक्ष का नाश कर मानव जाति को बचाया। माता वाराही को सप्त मातृका में स्थान मिला है। मां वाराही को मां त्रिपुरासुंदरी की सेनापति और लक्ष्मी का स्वरूप भी माना गया है। भारत में माता वाराही के बहुत ही कम प्रसिद्ध मंदिर है। उनमें से प्रयागराज में संगम घाट के पास कुछ ही दूरी पर स्थित वाराह वाराही मंदिर अत्यंत ही सिद्ध और प्राचीन मंदिर माना गया है। इसे सिद्धपीठ तीर्थ भी कहते हैं। यहां पूजा में भाग लेना अत्यंत ही शुभ फलदाई माना गया है। कहा जाता है इस स्थान पर धरती माता ने अपने आपको हिरण्याक्ष के चंगुल से छुड़ाने के लिए भगवान विष्णु की प्रार्थना की थी। जो भी भक्त सच्चे हृदय से यहां वाराह वाराही की पूजा में भाग लेता है भगवान उन्हें भूमि भवन संपत्ति प्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं।
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